अल-मुद्दस्सिर · 46/56
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मुद्दस्सिर
وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدِّينِ ۝٤٦
Wa kunnaa nukazzibu bi yawmid Deen
📖 हिंदी अर्थ
और रोज़ जज़ा को झुठलाया करते थे (और यूँ ही रहे)

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نُكَذِّبُ: हम झुठलाते थे।
  • يَوْمِ الدِّينِ: प्रतिफल (बदला) का दिन, यानी क़ियामत का दिन जब अल्लाह हर व्यक्ति को उसके कर्मों का बदला देगा।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन अपराधियों के कथन का हिस्सा है जो जहन्नम में होंगे। जब उनसे पूछा जाएगा कि "तुम्हें जहन्नम में क्या चीज़ ले गई?" तो वे अपने उन कार्यों को गिनाएँगे जिनके कारण वे इस अंजाम तक पहुँचे। इस आयत में वे स्वीकार करते हैं कि "हम प्रतिफल के दिन (क़ियामत) को झुठलाते थे।"

अर्थात्, उनका यह विश्वास नहीं था कि मृत्यु के बाद कोई जीवन है, न ही वे यह मानते थे कि अच्छे और बुरे कर्मों का कोई हिसाब होगा। उन्होंने इस दिन के आने को असंभव समझा और इसके बारे में संदेह किया। यही उनका यह झुठलाना उनके सारे बुरे कर्मों की जड़ था, क्योंकि जब कोई व्यक्ति क़ियामत के दिन पर विश्वास नहीं करता, तो वह न तो अच्छे कर्म करने की परवाह करता है और न ही बुरे कर्मों से बचता है।

यह आयत हमें सिखाती है कि क़ियामत के दिन पर ईमान (विश्वास) ही वह चीज़ है जो इंसान को गुनाहों से रोकती है। जो व्यक्ति इस दिन पर यक़ीन रखता है, वह जानता है कि उसका हर छोटा-बड़ा कर्म लिखा जा रहा है और उसे उसका बदला मिलेगा। यही विश्वास उसे नमाज़ पढ़ने, गरीबों की मदद करने, सच बोलने और बुराई से बचने की ताक़त देता है।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में क़ियामत के दिन पर ईमान रखते हैं? अगर हमारा ईमान सच्चा होता, तो हमारे कर्म उस ईमान के अनुसार होते। आज हम देखते हैं कि बहुत से लोग नमाज़ छोड़ देते हैं, रिश्तेदारों के हक़ मारते हैं, सूद खाते हैं, झूठ बोलते हैं — यह सब इसलिए है क्योंकि उनके दिलों में क़ियामत का डर कमज़ोर है। अल्लाह हमें सच्चा ईमान दे और हमें उन लोगों में से न बनाए जो इस दिन को झुठलाते हैं। आमीन।



📜 आयत 44-48 — सूरा अल-मुद्दस्सिर

44وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ
और न मोहताजों को खाना खिलाते थे
45وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَائِضِينَ
और अहले बातिल के साथ हम भी बड़े काम में घुस पड़ते थे
46وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدِّينِ
और रोज़ जज़ा को झुठलाया करते थे (और यूँ ही रहे)
47حَتَّىٰ أَتَانَا الْيَقِينُ
यहाँ तक कि हमें मौत आ गयी
48فَمَا تَنفَعُهُمْ شَفَاعَةُ الشَّافِعِينَ
तो (उस वक्त) उन्हें सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश कुछ काम न आएगी
अल-मुद्दस्सिरकुरान सूची
56आयत
मक्कीअवतरण स्थान
46आयत

अनुवाद — अल-मुद्दस्सिर 46

सूरा अल-मुद्दस्सिर आयत 46 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और रोज़ जज़ा को झुठलाया करते थे (और यूँ ही…

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Thursday, October 1, 2026

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