अन-नाज़ियात · 46/46
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नाज़ियात
كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُوا إِلَّا عَشِيَّةً أَوْ ضُحَاهَا ۝٤٦
Ka annahum Yawma yarawnahaa lam yalbasooo illaa `ashiyyatan aw duhaahaa
📖 हिंदी अर्थ
जिस दिन वह लोग इसको देखेंगे तो (समझेंगे कि दुनिया में) बस एक शाम या सुबह ठहरे थे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَمْ يَلْبَثُوا: वे ठहरे नहीं, अर्थात उन्होंने (दुनिया में) अधिक समय नहीं बिताया।
  • عَشِيَّةً: शाम का समय, सूर्यास्त से पहले का वक्त।
  • ضُحَاهَا: उसी दिन की सुबह, यानी दिन का पहला हिस्सा (चाश्त का वक्त)।

तफ़सीर (व्याख्या):

जिस दिन क़यामत आएगी और लोग अपनी क़ब्रों से उठकर हश्र के मैदान में हाज़िर होंगे, उस दिन उन्हें दुनिया की ज़िंदगी बेहद छोटी और मामूली लगेगी। उस वक्त की दहशत और भयावहता इतनी ज़बरदस्त होगी कि उन्हें अपनी पूरी दुनियावी ज़िंदगी यूँ महसूस होगी जैसे उन्होंने एक शाम या उसकी सुबह ही गुज़ारी हो। यानी दुनिया की लंबी से लंबी उम्र भी उस दिन के मुक़ाबले में एक पल के बराबर नज़र आएगी।

यह बात कुफ़्फ़ारे मक्का के लिए विशेष रूप से कही गई है, जो आख़िरत के दिन को दूर की बात समझते थे और मज़ाक़ उड़ाया करते थे। उन्हें बताया जा रहा है कि जब वह दिन आएगा, तो उन्हें अपनी दुनियावी ज़िंदगी की लंबाई का कोई अहसास नहीं रहेगा, बल्कि वे समझेंगे कि उन्होंने बहुत थोड़ा समय ही दुनिया में बिताया है। यह उनके लिए एक सबक़ और चेतावनी है कि वे इस छोटी सी ज़िंदगी को ग़लत रास्ते पर बर्बाद न करें।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की ज़िंदगी चाहे जितनी लंबी हो, आख़िरत के सामने वह बहुत कम है। इसलिए हमें अपने इस छोटे से समय को अल्लाह की इबादत, नेक कामों और दूसरों की भलाई में गुज़ारना चाहिए। जो लोग आज दुनिया के मोह में डूबे हैं और आख़िरत को भूल गए हैं, उन्हें इस आयत से सबक़ लेना चाहिए कि वह दिन ज़रूर आएगा, और उस दिन पछताने का कोई फ़ायदा नहीं होगा। अल्लाह तआला रहीम और करीम है, उसने हमें मौका दिया है कि हम तौबा करें, अपने गुनाहों से बाज़ आएं और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ बनाएं। यही हमारी कामयाबी है, दुनिया में भी और आख़िरत में भी।



📜 आयत 44-46 — सूरा अन-नाज़ियात

44إِلَىٰ رَبِّكَ مُنتَهَاهَا
तो तुम उसके ज़िक्र से किस फ़िक्र में हो
45إِنَّمَا أَنتَ مُنذِرُ مَن يَخْشَاهَا
उस (के इल्म) की इन्तेहा तुम्हारे परवरदिगार ही तक है तो तुम बस जो उससे डरे उसको डराने वाले हो
46كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُوا إِلَّا عَشِيَّةً أَوْ ضُحَاهَا
जिस दिन वह लोग इसको देखेंगे तो (समझेंगे कि दुनिया में) बस एक शाम या सुबह ठहरे थे
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अनुवाद — अन-नाज़ियात 46

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Monday, September 28, 2026

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