Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- تَحَاضُّونَ: एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना, उभारना।
- طَعَامِ الْمِسْكِينِ: ग़रीब और ज़रूरतमंद को खाना खिलाना।
तफ़सीर:
इस आयत में अल्लाह तआला इंसान के उस रवैये पर निंदा करते हैं जिसमें वह ग़रीबों और मिस्कीनों के प्रति संवेदनहीन हो जाता है। यहाँ बताया गया है कि जिस तरह लोग यतीम की इज़्ज़त नहीं करते और उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते, उसी तरह वे एक-दूसरे को ग़रीबों को खाना खिलाने की तरग़ीब भी नहीं देते। यानी अकेले खुद भी अच्छा नहीं करते और दूसरों को भी भलाई की तरफ़ नहीं बुलाते। इससे समाज में बुराई फैलती है और ग़रीबों के हक़ मारे जाते हैं।
इस आयत में अल्लाह तआला ने "تَحَاضُّونَ" का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया है जिसका मतलब है कि एक-दूसरे को उभारना और प्रोत्साहित करना। यानी सिर्फ़ खुद अच्छा करना काफ़ी नहीं, बल्कि दूसरों को भी अच्छाई की तरफ़ बुलाना चाहिए। अगर कोई इंसान खुद ग़रीब की मदद नहीं कर सकता, तो कम से कम दूसरों को इस काम की तरग़ीब तो दे सकता है। यह भाईचारे और सामाजिक ज़िम्मेदारी का एहसास है।
इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि दूसरों के हक़ों का ख़याल रखना भी इस्लाम का अहम हिस्सा है। ग़रीबों और मिस्कीनों की मदद करना, उन्हें खाना खिलाना और दूसरों को भी इस काम की तरग़ीब देना — यह सब नेकी के काम हैं जिन पर अल्लाह तआला ख़ुश होता है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "वह मुसलमान कामिल नहीं जो पेट भरकर सोए और उसका पड़ोसी भूखा हो।" इसलिए हमें चाहिए कि हम ग़रीबों की मदद करें और दूसरों को भी इस नेक काम की तरफ़ बुलाएँ। यही अल्लाह को पसंद है और यही हमारी कामयाबी का ज़रिया है।
📜 आयत 16-20 — सूरा अल-फज्र
अनुवाद — अल-फज्र 18
सूरा अल-फज्र आयत 18 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और न मोहताज को खाना खिलाने की तरग़ीब देते होसूरा आयत 18/30 — सूरा अल-फज्र الفجر (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-फज्र सुनें, सूरा अल-फज्र अनुवाद, सूरा अल-फज्र mp3, सूरा अल-फज्र pdf. आयत 16–20. हिंदी अर्थ: اردو.
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Monday, September 28, 2026
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