यूनुस · 10/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
دَعْوَاهُمْ فِيهَا سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَتَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَامٌ ۚ وَآخِرُ دَعْوَاهُمْ أَنِ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ ۝١٠
Da`waahum feehaa Subbaanakal laahumma wa tahiyyatuhum feehaa salaam; wa aakhiru da`waahum anil hamdu lillaahi Rabbil `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
उन बाग़ों में उन लोगों का बस ये कौल होगा ऐ ख़ुदा तू पाक व पाकीज़ा है और उनमें उनकी बाहमी (आपसी) खैरसलाही (मुलाक़ात) सलाम से होगी और उनका आख़िरी क़ौल ये होगा कि सब तारीफ ख़ुदा ही को सज़ावार है जो सारे जहाँन का पालने वाला है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • دَعْوَاهُمْ: उनका पुकारना, उनकी दुआ या प्रार्थना।
  • سُبْحَانَكَ: तेरी पवित्रता का गुणगान, तू हर ऐब और कमी से पाक है।
  • تَحِيَّتُهُمْ: उनका अभिवादन, एक-दूसरे को सलाम करना।
  • آخِرُ دَعْوَاهُمْ: उनकी दुआ का अंतिम शब्द या आख़िरी पुकार।

विस्तृत व्याख्या:

अल्लाह तआला इस आयत में जन्नत के लोगों की हालत का वर्णन कर रहे हैं कि जब वे जन्नत में दाखिल होंगे, तो उनकी ज़ुबान पर जो पहला कलाम आएगा, वह "سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ" (ऐ अल्लाह! तू पाक है) होगा। यानी वे अल्लाह की तारीफ और उसकी पवित्रता का इज़हार करेंगे, क्योंकि जन्नत की नेमतें देखकर उनका दिल अल्लाह की महानता और पाकी के एहसास से भर जाएगा। यह उनका दुआ करने का तरीका होगा — तारीफ और तस्बीह के साथ।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि उनका आपसी अभिवादन "सलाम" होगा। यानी जब वे एक-दूसरे से मिलेंगे, तो एक-दूसरे को "सलाम" कहेंगे, और अल्लाह की तरफ से भी उनके लिए सलामती और शांति का पैग़ाम होगा। यह सलाम उनके लिए अम्न, सुकून और हर बुराई से सुरक्षा की निशानी है।

और उनकी दुआ का आख़िरी कलाम "अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" होगा। यानी जब वे जन्नत की नेमतों का पूरा आनंद ले चुकेंगे और हर लज़्ज़त का मज़ा चख चुकेंगे, तो उनकी ज़ुबान से निकलेगा: "सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का पालनहार है।" यानी उनकी ज़िंदगी का आग़ाज़ भी अल्लाह की तारीफ से होगा और अंजाम भी अल्लाह की हम्द से। वे हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करते रहेंगे।

महत्वपूर्ण शिक्षाएँ और फ़ायदे:

  1. जन्नत की ज़िंदगी भी अल्लाह की याद और तारीफ से भरी होगी — यह दिखाता है कि अल्लाह की याद ही असली सुकून और खुशी का ज़रिया है।
  2. मोमिन की ज़ुबान पर हमेशा अल्लाह की तस्बीह और हम्द होनी चाहिए, चाहे वह दुनिया में हो या आख़िरत में — यह उसकी पहचान है।
  3. सलाम करना इस्लामी तहज़ीब का हिस्सा है और जन्नत में भी यही अभिवादन होगा — इसलिए हमें दुनिया में भी सलाम को आम करना चाहिए।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि हर नेमत के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए, और हमारी ज़ुबान का इस्तेमाल अच्छे कलाम, तारीफ और दुआ में होना चाहिए।
  5. जन्नत की यह तस्वीर हमें अमल की तरफ राग़िब करती है कि हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक बनाएँ, ताकि हम भी उस मुक़ाम तक पहुँच सकें जहाँ सिर्फ़ सलाम, सुकून और अल्लाह की हम्द हो।


📜 आयत 8-12 — यूनुस

8أُولَٰئِكَ مَأْوَاهُمُ النَّارُ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
यही वह लोग हैं जिनका ठिकाना उनकी करतूत की बदौलत जहन्नुम है
9إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ يَهْدِيهِمْ رَبُّهُم بِإِيمَانِهِمْ ۖ تَجْرِي مِن تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ
बेशक जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन्हें उनका परवरदिगार उनके ईमान के सबब से मंज़िल मक़सूद तक पहुँचा देगा कि आराम व आसाइश के बाग़ों में (रहेगें) और उन के नीचे नहरें जारी होगी
10دَعْوَاهُمْ فِيهَا سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَتَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَامٌ ۚ وَآخِرُ دَعْوَاهُمْ أَنِ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
उन बाग़ों में उन लोगों का बस ये कौल होगा ऐ ख़ुदा तू पाक व पाकीज़ा है और उनमें उनकी बाहमी (आपसी) खैरसलाही (मुलाक़ात) सलाम से होगी और उनका आख़िरी क़ौल ये होगा कि सब तारीफ ख़ुदा ही को सज़ावार है जो सारे जहाँन का पालने वाला है
11۞ وَلَوْ يُعَجِّلُ اللَّهُ لِلنَّاسِ الشَّرَّ اسْتِعْجَالَهُم بِالْخَيْرِ لَقُضِيَ إِلَيْهِمْ أَجَلُهُمْ ۖ فَنَذَرُ الَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ
और जिस तरह लोग अपनी भलाई के लिए जल्दी कर बैठे हैं उसी तरह अगर ख़ुदा उनकी शरारतों की सज़ा में बुराई में जल्दी कर बैठता है तो उनकी मौत उनके पास कब की आ चुकी होती मगर हम तो उन लोगों को जिन्हें (मरने के बाद) हमारी हुज़ूरी का खटका नहीं छोड़ देते हैं कि वह अपनी सरकशी में आप सरग़िरदा रहें
12وَإِذَا مَسَّ الْإِنسَانَ الضُّرُّ دَعَانَا لِجَنبِهِ أَوْ قَاعِدًا أَوْ قَائِمًا فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُ ضُرَّهُ مَرَّ كَأَن لَّمْ يَدْعُنَا إِلَىٰ ضُرٍّ مَّسَّهُ ۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلْمُسْرِفِينَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और इन्सान को जब कोई नुकसान छू भी गया तो अपने पहलू पर (लेटा हो) या बैठा हो या ख़ड़ा (गरज़ हर हालत में) हम को पुकारता है फिर जब हम उससे उसकी तकलीफ को दूर कर देते है तो ऐसा खिसक जाता है जैसे उसने तकलीफ के (दफा करने के) लिए जो उसको पहुँचती थी हमको पुकारा ही न था जो लोग ज्यादती करते हैं उनकी कारस्तानियाँ यूँ ही उन्हें अच्छी कर दिखाई गई हैं
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Tuesday, August 18, 2026

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