अल-मोमिनुन · 64/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
حَتَّىٰ إِذَا أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِم بِالْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْأَرُونَ ۝٦٤
Hattaaa izaaa akhznaa mutrafeehim bil`azaabi izaa hum yaj`aroon
📖 हिंदी अर्थ
यहाँ तक कि जब हम उनके मालदारों को अज़ाब में गिरफ््तार करेंगे तो ये लोग वावैला करने लगेंगें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مُتْرَفِيهِم (मुतरफ़ीहिम): अर्थात उनके सुख-समृद्धि में डूबे हुए, ऐशो-आराम की ज़िंदगी बिताने वाले, धन-दौलत के मालिक।
  • بِالْعَذَابِ (बिल-'अज़ाब): अर्थात यातना या पकड़ के साथ।
  • يَجْأَرُونَ (यज'अरून): अर्थात वे चीख़-पुकार करते हैं, गिड़गिड़ाते हैं, और ऊँची आवाज़ से फ़रियाद करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के हाल का वर्णन करती है जो अपनी दुनियावी सुख-सुविधाओं और ऐशो-आराम में मग्न रहते हैं, और जब उन पर अल्लाह की पकड़ आती है, तो वे बेबस होकर चीख़ने-चिल्लाने लगते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब हम उनके सुख-समृद्धि वाले लोगों (मुतरफ़ीन) को अज़ाब में पकड़ते हैं, तो वे अचानक फ़रियाद करने लगते हैं — यानी वे अपनी सारी शान-ओ-शौकत भूलकर गिड़गिड़ाने और मदद माँगने पर मजबूर हो जाते हैं।

यह अज़ाब उन्हें दुनिया में भी आ सकता है, जैसा कि बद्र के दिन कुफ़्फ़ार के सरदारों के साथ हुआ, और आख़िरत में भी उन्हें सख़्त से सख़्त अज़ाब का सामना करना पड़ेगा। जब ये लोग अपनी ताक़त और सामर्थ्य पर इतराते थे, तो उन्हें यक़ीन नहीं था कि अल्लाह की पकड़ कितनी सख़्त है। लेकिन जब वह पकड़ आती है, तो उनकी सारी बड़ाई मिट्टी में मिल जाती है, और वे मजबूर होकर रोने-चिल्लाने लगते हैं।

दावती पहलू (नसीहत):

यह आयत हमें बताती है कि दुनिया की चमक-दमक और ऐशो-आराम कभी भी अल्लाह की पकड़ से नहीं बचा सकते। जो लोग आज अपनी दौलत और ताक़त पर घमंड करते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि अल्लाह की पकड़ बहुत सख़्त है। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी में अल्लाह की नाफ़रमानी से बचें और उसकी रहमत के तलबगार रहें। जब हम सुख-समृद्धि में हों, तो शुक्रगुज़ार बनें, और जब मुसीबत आए, तो सब्र करें — क्योंकि अल्लाह की रहमत उन लोगों के करीब है जो उसकी ओर झुकते हैं और उससे माफ़ी माँगते हैं। यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की याद और उसकी इबादत ही असली सुकून है, और दुनिया की दौलत कभी भी हमें अल्लाह की पकड़ से नहीं बचा सकती।

🎧 सुनें

📜 आयत 62-66 — अल-मोमिनुन

62وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَلَدَيْنَا كِتَابٌ يَنطِقُ بِالْحَقِّ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
और हम तो किसी शख्स को उसकी क़ूवत से बढ़के तकलीफ देते ही नहीं और हमारे पास तो (लोगों के आमाल की) किताब है जो बिल्कुल ठीक (हाल बताती है) और उन लोगों की (ज़र्रा बराबर) हक़ तलफी नहीं की जाएगी
63بَلْ قُلُوبُهُمْ فِي غَمْرَةٍ مِّنْ هَٰذَا وَلَهُمْ أَعْمَالٌ مِّن دُونِ ذَٰلِكَ هُمْ لَهَا عَامِلُونَ
उनके दिल उसकी तरफ से ग़फलत में पडे हैं इसके अलावा उन के बहुत से आमाल हैं जिन्हें ये (बराबर किया करते है) और बाज़ नहीं आते
64حَتَّىٰ إِذَا أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِم بِالْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْأَرُونَ
यहाँ तक कि जब हम उनके मालदारों को अज़ाब में गिरफ््तार करेंगे तो ये लोग वावैला करने लगेंगें
65لَا تَجْأَرُوا الْيَوْمَ ۖ إِنَّكُم مِّنَّا لَا تُنصَرُونَ
(उस वक्त क़हा जाएगा) आज वावैला मत करों तुमको अब हमारी तरफ से मदद नहीं मिल सकती
66قَدْ كَانَتْ آيَاتِي تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ تَنكِصُونَ
(जब) हमारी आयतें तुम्हारे सामने पढ़ी जाती थीं तो तुम अकड़ते किस्सा कहते बकते हुए उन से उलटे पाँव फिर जाते
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 64

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Tuesday, August 18, 2026

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