आल-इमरान · 139/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَنتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۝١٣٩
Wa laa tahinoo wa laa tahzanoo wa antumul a`lawna in kuntum mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
और मुसलमानों काहिली न करो और (इस) इत्तफ़ाक़ी शिकस्त (ओहद से) कुढ़ो नहीं (क्योंकि) अगर तुम सच्चे मोमिन हो तो तुम ही ग़ालिब और वर रहोगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا تَهِنُوا – कमज़ोर मत पड़ो, हिम्मत मत हारो।
  • وَلَا تَحْزَنُوا – उदास मत हो, ग़मगीन मत हो।
  • الْأَعْلَوْنَ – सर्वोच्च, ऊँचे, ग़ालिब और बुलंद।
  • إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ – अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो (यहाँ "إن" का अर्थ "क्योंकि" या "जब कि" है)।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमानवालो! जिहाद और दुश्मन से मुक़ाबले में कमज़ोरी और सुस्ती न दिखाओ, और न ही उन मुसीबतों और नुक़सान पर उदास हो जाओ जो तुम्हें उहुद के मैदान में पहुँचे। तुम्हारे लिए यह रवैया उचित नहीं है, क्योंकि तुम अपने ईमान की बदौलत सबसे ऊँचे और बुलंद हो। तुम्हारी सच्ची इज़्ज़त और कामयाबी आख़िरत में जन्नत की शक्ल में है, और दुनिया में भी अल्लाह की मदद से तुम्हारी ही फ़तह होगी और अंजाम तुम्हारे ही हक़ में बेहतर होगा। यह ऊँचाई और ग़लबा तुम्हें इसलिए मिला है क्योंकि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखते हो और उसकी शरीअत की पैरवी करते हो। अल्लाह का वादा है कि वह अपने मुत्तक़ी (परहेज़गार) बंदों की मदद करता है, इसलिए निराशा और ग़म की कोई गुंजाइश नहीं।

फ़ायदे (सबक़):

  1. मुसलमान की पहचान यह है कि वह मुश्किलों में भी कमज़ोर नहीं पड़ता, क्योंकि उसका भरोसा अल्लाह पर होता है।
  2. ईमान ही असली ताक़त और बुलंदी का ज़रिया है; जिसके पास ईमान है, वह कभी हारा हुआ नहीं होता।
  3. दुनिया की मुसीबतें और नुक़सान अस्थायी हैं, आख़िरत की कामयाबी ही असली कामयाबी है — यही सोच मुसलमान को सब्र और स्थिरता देती है।
  4. अल्लाह का वादा है कि ईमानवालों की मदद करेगा, इसलिए निराशा शैतान का काम है, और उम्मीद ईमान की निशानी है।
  5. यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि हार के बाद भी हौसला बुलंद रखें, क्योंकि असली फ़तह उन्हीं की होती है जो अल्लाह पर यक़ीन रखते हैं।


📜 आयत 137-141 — आल-इमरान

137قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِكُمْ سُنَنٌ فَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ
तुमसे पहले बहुत से वाक़यात गुज़र चुके हैं पस ज़रा रूए ज़मीन पर चल फिर कर देखो तो कि (अपने अपने वक्त क़े पैग़म्बरों को) झुठलाने वालों का अन्जाम क्या हुआ
138هَٰذَا بَيَانٌ لِّلنَّاسِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةٌ لِّلْمُتَّقِينَ
ये (जो हमने कहा) आम लोगों के लिए तो सिर्फ़ बयान (वाक़या) है मगर और परहेज़गारों के लिए हिदायत व नसीहत है
139وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَنتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
और मुसलमानों काहिली न करो और (इस) इत्तफ़ाक़ी शिकस्त (ओहद से) कुढ़ो नहीं (क्योंकि) अगर तुम सच्चे मोमिन हो तो तुम ही ग़ालिब और वर रहोगे
140إِن يَمْسَسْكُمْ قَرْحٌ فَقَدْ مَسَّ الْقَوْمَ قَرْحٌ مِّثْلُهُ ۚ وَتِلْكَ الْأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِ وَلِيَعْلَمَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَتَّخِذَ مِنكُمْ شُهَدَاءَ ۗ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ
अगर (जंगे ओहद में) तुमको ज़ख्म लगा है तो उसी तरह (बदर में) तुम्हारे फ़रीक़ (कुफ्फ़ार को) भी ज़ख्म लग चुका है (उस पर उनकी हिम्मत तो न टूटी) ये इत्तफ़ाक़ाते ज़माना हैं जो हम लोगों के दरमियान बारी बारी उलट फेर किया करते हैं और ये (इत्तफ़ाक़ी शिकस्त इसलिए थी) ताकि ख़ुदा सच्चे ईमानदारों को (ज़ाहिरी) मुसलमानों से अलग देख लें और तुममें से बाज़ को दरजाए शहादत पर फ़ायज़ करें और ख़ुदा (हुक्मे रसूल से) सरताबी करने वालों को दोस्त नहीं रखता
141وَلِيُمَحِّصَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَمْحَقَ الْكَافِرِينَ
और ये (भी मंजूर था) कि सच्चे ईमानदारों को (साबित क़दमी की वजह से) निरा खरा अलग कर ले और नाफ़रमानों (भागने वालों) का मटियामेट कर दे
आल-इमरानकुरान सूची
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अनुवाद — आल-इमरान 139

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Tuesday, August 18, 2026

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