अस-साफ्फात · 105/182
अनुवाद उच्चारण — सूरा अस-साफ्फात
قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا ۚ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ ۝١٠٥
Qad saddaqtar ru`yaa; innaa kazaalika najzil muhsineen
📖 हिंदी अर्थ
तुमने अपने ख्वाब को सच कर दिखाया अब तुम दोनों को बड़े मरतबे मिलेगें हम नेकी करने वालों को यूँ जज़ाए ख़ैर देते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • صَدَّقْتَ (सद्दक़्त): तुमने सच कर दिखाया, पूरा कर दिया।
  • الرُّؤْيَا (रु'या): स्वप्न, ख़्वाब (जो अल्लाह की ओर से सच्चा स्वप्न था)।
  • نَجْزِي (नज्ज़ी): हम बदला देते हैं, प्रतिफल देते हैं।
  • الْمُحْسِنِينَ (अल-मुहसिनीन): नेकी करने वाले, अच्छे कर्म करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को अल्लाह के हुक्म की तामील के लिए माथे के बल लिटाया और छुरी चलाने का इरादा किया, तो अल्लाह तआला ने उस नाज़ुक और कठिन घड़ी में उन्हें पुकारा: "ऐ इब्राहीम! तुमने अपने स्वप्न को सच कर दिखाया।" यानी तुमने वह सब कुछ कर दिखाया जो तुम्हें हुक्म दिया गया था—तुमने अपने बेटे को क़ुर्बान करने का पूरा इरादा और पूरी कोशिश की। अल्लाह को तुम्हारी नीयत और तुम्हारे अमल की सच्चाई मालूम थी, इसलिए उसने तुम्हें इस महान इम्तिहान में कामयाबी अता की।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "बेशक हम इसी तरह नेकी करने वालों को बदला देते हैं।" यानी जो लोग अल्लाह के हुक्मों पर पूरे दिल से अमल करते हैं, जो मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अल्लाह की रज़ा को अपनी ख़्वाहिशों पर तरजीह देते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत की तंगी और मुसीबतों से निकालकर राहत और कामयाबी अता करता है। यह अल्लाह का सुन्नत (क़ानून) है कि वह मुहसिनीन (नेकी करने वालों) को उनकी नेकी का अच्छा बदला देता है और उनकी मुश्किलें आसान कर देता है।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है कि जब हम अल्लाह के हुक्म पर पूरा भरोसा करके अमल करते हैं, तो अल्लाह हमारी मदद करता है और हमें कभी नाकाम नहीं होने देता। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी की यह घटना हमें सिखाती है कि अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्यारी चीज़ को भी क़ुर्बान करने के लिए तैयार रहना चाहिए, और अल्लाह उसके बदले में उससे भी बेहतर चीज़ अता करता है। यही वजह है कि आज तक क़ुरबानी का यह सिलसिला जारी है, और हर साल ईद-उल-अज़हा पर हम इसी सुन्नत को ज़िंदा करते हैं। अल्लाह हमें भी अपने हुक्मों पर सच्चे दिल से अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 103-107 — सूरा अस-साफ्फात

103فَلَمَّا أَسْلَمَا وَتَلَّهُ لِلْجَبِينِ
फिर जब दोनों ने ये ठान ली और बाप ने बेटे को (ज़िबाह करने के लिए) माथे के बल लिटाया
104وَنَادَيْنَاهُ أَن يَا إِبْرَاهِيمُ
और हमने (आमादा देखकर) आवाज़ दी ऐ इबराहीम
105قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا ۚ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
तुमने अपने ख्वाब को सच कर दिखाया अब तुम दोनों को बड़े मरतबे मिलेगें हम नेकी करने वालों को यूँ जज़ाए ख़ैर देते हैं
106إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ
इसमें शक नहीं कि ये यक़ीनी बड़ा सख्त और सरीही इम्तिहान था
107وَفَدَيْنَاهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ
और हमने इस्माईल का फ़िदया एक ज़िबाहे अज़ीम (बड़ी कुर्बानी) क़रार दिया
अस-साफ्फातकुरान सूची
182आयत
मक्कीअवतरण स्थान
105आयत

अनुवाद — अस-साफ्फात 105

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Saturday, October 3, 2026

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