अस-साफ्फात · 16/182
अनुवाद उच्चारण — अस-साफ्फात
أَإِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ ۝١٦
A-izaa mitnaa wa kunnaa turaabanw wa `izaaman `ainnaa lamab`oosoon
📖 हिंदी अर्थ
भला जब हम मर जाएँगे और ख़ाक और हड्डियाँ रह जाएँगे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَإِذَا مِتْنَا: क्या जब हम मर जाएँगे
  • تُرَابًا: मिट्टी
  • وَعِظَامًا: और हड्डियाँ
  • لَمَبْعُوثُونَ: दोबारा उठाए जाने वाले (जीवित किए जाने वाले)

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन काफ़िरों का क़ौल (कथन) बयान कर रही है जो आख़िरत (परलोक) के दिन को नहीं मानते थे। वे हैरानी और इन्कार के साथ कहते थे: "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी तथा बिखरी हुई हड्डियों में बदल जाएँगे, तो क्या सचमुच हम दोबारा जीवित करके उठाए जाएँगे?" उनकी यह बात अज्ञानता और अक़्ल से दूर होने की वजह से थी, क्योंकि उन्होंने यह समझ लिया था कि मौत के बाद दोबारा ज़िंदगी नामुमकिन है।

यहाँ अल्लाह तआला उनके इस इन्कार का जवाब देते हुए आगे की आयतों में फ़रमाते हैं कि जिस अल्लाह ने पहली बार पैदा किया, वही दोबारा पैदा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर (सक्षम) है। क्या उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि जिस रब ने आसमान और ज़मीन को पैदा किया, वह मरे हुए इंसानों को दोबारा ज़िंदा करने पर क़ादिर नहीं है?

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें यक़ीन दिलाती है कि मौत अंत नहीं है, बल्कि एक नई ज़िंदगी की शुरुआत है। जो लोग आख़िरत को नहीं मानते, वे सिर्फ़ अपनी नफ़्सियात (इच्छाओं) की पैरवी करते हैं और उन्हें यह अंदेशा है कि अगर उन्होंने आख़िरत मान ली, तो उन्हें अपने गुनाहों का हिसाब देना होगा। लेकिन एक मोमिन (ईमानवाला) के लिए यह आयत सबसे बड़ी ख़ुशख़बरी है कि उसका रब उसे मौत के बाद ज़रूर ज़िंदा करेगा और उसके अच्छे आमाल (कर्मों) का पूरा बदला देगा।

अल्लाह तआला की क़ुदरत (शक्ति) पर ग़ौर करें: वह हर साल ज़मीन को मुर्दा करने के बाद बहार (वसंत) के मौसम में दोबारा ज़िंदा करता है। जिस रब के लिए यह आसान है, उसके लिए इंसानों को दोबारा ज़िंदा करना क्या मुश्किल है? यही वह यक़ीन है जो मोमिन को सब्र और शुक्र की ज़िंदगी देता है, और उसे अमल (नेक काम) की तरफ़ राग़िब (प्रेरित) करता है। आइए, हम इस यक़ीन को अपने दिलों में मज़बूत करें और अपनी ज़िंदगी को उस दिन के हिसाब के लिए तैयार करें।

🎧 सुनें

📜 आयत 14-18 — अस-साफ्फात

14وَإِذَا رَأَوْا آيَةً يَسْتَسْخِرُونَ
और जब किसी मौजिजे क़ो देखते हैं तो (उससे) मसख़रापन करते हैं
15وَقَالُوا إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ
और कहते हैं कि ये तो बस खुला हुआ जादू है
16أَإِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
भला जब हम मर जाएँगे और ख़ाक और हड्डियाँ रह जाएँगे
17أَوَآبَاؤُنَا الْأَوَّلُونَ
तो क्या हम या हमारे अगले बाप दादा फिर दोबारा क़ब्रों से उठा खड़े किए जाँएगे
18قُلْ نَعَمْ وَأَنتُمْ دَاخِرُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि हाँ (ज़रूर उठाए जाओगे)
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अनुवाद — अस-साफ्फात 16

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Tuesday, August 18, 2026

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