अल-क़मर · 5/55
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़मर
حِكْمَةٌ بَالِغَةٌ ۖ فَمَا تُغْنِ النُّذُرُ ۝٥
Hikmatum baalighatun famaa tughnin nuzur
📖 हिंदी अर्थ
और इन्तेहा दर्जे की दानाई मगर (उनको तो) डराना कुछ फ़ायदा नहीं देता

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • حِكْمَةٌ بَالِغَةٌ: परिपूर्ण और अत्यंत उच्च कोटि की बुद्धि-युक्त बात, जो अपनी मंज़िल तक पहुँच चुकी हो।
  • فَمَا تُغْنِ النُّذُرُ: डराने-सावधान करने वाली चेतावनियाँ किसी काम न आएँ।

तफ़सीर:

यह क़ुरआन जो इनकार करने वालों के पास आया है, वह अपने आप में एक बेहद परिपूर्ण और अक्लमंदी भरी हिदायत है, जो हर उस चीज़ को साफ़-साफ़ बयान करती है जिसकी इंसान को ज़रूरत है। यह हिकमत अपनी आख़िरी हद तक पहुँच चुकी है — इसमें कोई कमी नहीं, कोई खामी नहीं। यह सच्चाई को इस कदर वाज़ेह करती है कि किसी भी ज़िम्मेदार इंसान के पास बहाने की गुंजाइश नहीं बचती।

लेकिन सवाल यह है कि जब यह हिकमत इतनी मुकम्मल है, तो फिर डराने वाली चेतावनियाँ (नुज़ुर) उन लोगों को क्या फ़ायदा पहुँचा सकती हैं जिन्होंने पहले ही ईमान लाने से मुँह मोड़ लिया है और सच्चाई को झुठला दिया है? यह एक तोबीख़ (फटकार) का अंदाज़ है — यानी ऐसे लोगों के लिए नसीहत बेकार है, क्योंकि उनके दिलों पर मुहर लग चुकी है और वे हक़ को क़बूल करने के लिए तैयार ही नहीं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की हिदायत अपनी तरफ़ से हमेशा मुकम्मल और अद्भुत होती है, लेकिन उसका फ़ायदा उठाना इंसान की अपनी मर्ज़ी पर निर्भर है। जो दिल खुला हो, वह इस हिकमत से रौशन हो जाता है; और जो दिल अंधा हो, उसके लिए कोई भी चेतावनी कारगर नहीं होती।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें याद दिलाती है कि क़ुरआन की हर आयत एक कीमती खज़ाना है। जो इसे समझकर अपनी ज़िंदगी में उतार लेता है, वह कभी नाकाम नहीं होता। अल्लाह ने अपनी रहमत से हमें यह किताब दी है ताकि हम अंधेरों से निकलकर रौशनी की तरफ़ आएँ। आओ, हम इस हिकमत को अपने दिलों में जगह दें, और उन लोगों की तरह न बनें जिनके लिए चेतावनियाँ बेकार हो गईं। अल्लाह हमें सच्चाई को क़बूल करने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 3-7 — सूरा अल-क़मर

3وَكَذَّبُوا وَاتَّبَعُوا أَهْوَاءَهُمْ ۚ وَكُلُّ أَمْرٍ مُّسْتَقِرٌّ
और उन लोगों ने झुठलाया और अपनी नफ़सियानी ख्वाहिशों की पैरवी की, और हर काम का वक्त मुक़र्रर है
4وَلَقَدْ جَاءَهُم مِّنَ الْأَنبَاءِ مَا فِيهِ مُزْدَجَرٌ
और उनके पास तो वह हालात पहुँच चुके हैं जिनमें काफी तम्बीह थीं
5حِكْمَةٌ بَالِغَةٌ ۖ فَمَا تُغْنِ النُّذُرُ
और इन्तेहा दर्जे की दानाई मगर (उनको तो) डराना कुछ फ़ायदा नहीं देता
6فَتَوَلَّ عَنْهُمْ ۘ يَوْمَ يَدْعُ الدَّاعِ إِلَىٰ شَيْءٍ نُّكُرٍ
तो (ऐ रसूल) तुम भी उनसे किनाराकश रहो, जिस दिन एक बुलाने वाला (इसराफ़ील) एक अजनबी और नागवार चीज़ की तरफ़ बुलाएगा
7خُشَّعًا أَبْصَارُهُمْ يَخْرُجُونَ مِنَ الْأَجْدَاثِ كَأَنَّهُمْ جَرَادٌ مُّنتَشِرٌ
तो (निदामत से) ऑंखें नीचे किए हुए कब्रों से निकल पड़ेंगे गोया वह फैली हुई टिड्डियाँ हैं
अल-क़मरकुरान सूची
55आयत
मक्कीअवतरण स्थान
5आयत

अनुवाद — अल-क़मर 5

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पवित्र क़ुरआन


Thursday, October 1, 2026

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