(ऐ रसूल उनसे) पूछो तो कि (भला) जो कुछ आसमान और ज़मीन में है किसका है (वह जवाब देगें) तुम ख़ुद कह दो कि ख़ास ख़ुदा का है उसने अपनी ज़ात पर मेहरबानी लाज़िम कर ली है वह तुम सब के सब को क़यामत के दिन जिसके आने मे कुछ शक़ नहीं ज़रुर जमा करेगा (मगर) जिन लोगों ने अपना आप नुक़सान किया वह तो (क़यामत पर) ईमान न लाएंगें
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(ان سے) پوچھو کہ آسمان اور زمین میں جو کچھ ہے کس کا ہے کہہ دو خدا کا اس نے اپنی ذات (پاک) پر رحمت کو لازم کر لیا ہے وہ تم سب کو قیامت کے دن جس میں کچھ بھی شک نہیں ضرور جمع کرے گا جن لوگوں نے اپنے تیئیں نقصان میں ڈال رکھا ہے وہ ایمان نہیں لاتے
(ऐ रसूल उनसे) पूछो तो कि (भला) जो कुछ आसमान और ज़मीन में है किसका है (वह जवाब देगें) तुम ख़ुद कह दो कि ख़ास ख़ुदा का है उसने अपनी ज़ात पर मेहरबानी लाज़िम कर ली है वह तुम सब के सब को क़यामत के दिन जिसके आने मे कुछ शक़ नहीं ज़रुर जमा करेगा (मगर) जिन लोगों ने अपना आप नुक़सान किया वह तो (क़यामत पर) ईमान न लाएंगें
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
كَتَبَ عَلَىٰ نَفْسِهِ الرَّحْمَةَ: अपने ऊपर दया को अनिवार्य कर लिया।
لَيَجْمَعَنَّكُمْ: अल्लाह की क़सम खाकर कहा गया है कि वह तुम्हें अवश्य एकत्र करेगा।
خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ: जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला, अपने नुक़्सान का कारण बने।
तफ़सीर:
ऐ नबी! आप इन मुशरिकों से पूछिए: "आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है, उसका मालिक कौन है?" अगर वे जवाब दें, तो ठीक है, वरना आप ख़ुद कह दीजिए: "यह सब अल्लाह ही का है।" वे ख़ुद भी इस बात को जानते और मानते हैं कि सृष्टि का स्वामी अल्लाह ही है, फिर भी वे उसकी इबादत क्यों नहीं करते? अल्लाह ने अपने ऊपर दया को अनिवार्य कर लिया है, यानी वह अपने बंदों पर रहम करने वाला है और उन्हें जल्दी सज़ा नहीं देता, बल्कि उन्हें तौबा का मौक़ा देता है। अल्लाह की क़सम, वह तुम सबको क़यामत के दिन अवश्य एकत्र करेगा—उस दिन में कोई संदेह नहीं। उस दिन वह हर एक को उसके कर्मों का बदला देगा। जिन लोगों ने शिर्क किया और अल्लाह के साथ दूसरों को साझी ठहराया, उन्होंने अपने आपको बड़े घाटे में डाला, क्योंकि उन्होंने अपने लिए जहन्नम की आग ख़रीद ली। यही लोग हैं जो ईमान नहीं लाते, न अल्लाह की वहीदानियत को स्वीकार करते हैं, न उसके वादे और डरावने अंजाम पर यक़ीन करते हैं, और न आप (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की नबूवत को मानते हैं।
फ़ायदे:
अल्लाह की रहमत बहुत विशाल है—उसने अपने ऊपर दया को लिख लिया है, यानी वह अपने बंदों पर मेहरबान है और उन्हें मौक़ा देता है। इससे मुसलमान को उम्मीद रखनी चाहिए और अल्लाह की रहमत से कभी निराश नहीं होना चाहिए।
क़यामत का दिन निश्चित और सत्य है; इस पर ईमान रखना हर मुसलमान का ज़रूरी हिस्सा है। यह यक़ीन इंसान को अच्छे काम करने और गुनाहों से बचने की तरफ़ प्रेरित करता है।
शिर्क और कुफ़्र सबसे बड़ा नुक़्सान है—इंसान अपने आपको ख़ुद घाटे में डालता है। इसलिए हर इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह की इबादत में किसी को साझी न बनाए और अपने ईमान को शिर्क से पाक रखे।
अल्लाह की रहमत और उसका इंसाफ़ दोनों साथ हैं—वह रहम करने वाला है, लेकिन क़यामत के दिन हिसाब भी लेगा। यही बात इंसान को डर और उम्मीद के बीच रखती है, जो ईमान की रूह है।
(ऐ रसूल तुम दिल तंग न हो) तुम से पहले (भी) पैग़म्बरों के साथ मसख़रापन किया गया है पस जो लोग मसख़रापन करते थे उनको उस अज़ाब ने जिसके ये लोग हॅसी उड़ाते थे घेर लिया
(ऐ रसूल उनसे) पूछो तो कि (भला) जो कुछ आसमान और ज़मीन में है किसका है (वह जवाब देगें) तुम ख़ुद कह दो कि ख़ास ख़ुदा का है उसने अपनी ज़ात पर मेहरबानी लाज़िम कर ली है वह तुम सब के सब को क़यामत के दिन जिसके आने मे कुछ शक़ नहीं ज़रुर जमा करेगा (मगर) जिन लोगों ने अपना आप नुक़सान किया वह तो (क़यामत पर) ईमान न लाएंगें
ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या ख़ुदा को जो सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला है छोड़ कर दूसरे को (अपना) सरपरस्त बनाओ और वही (सब को) रोज़ी देता है और उसको कोई रोज़ी नहीं देता (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मुझे हुक्म दिया गया है कि सब से पहले इस्लाम लाने वाला मैं हूँ और (ये भी कि ख़बरदार) मुशरेकीन से न होना
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