अल-आराफ · 60/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
قَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ إِنَّا لَنَرَاكَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ۝٦٠
Qaalal mala-u min qaw miheee innaa lanaraaka fee dalaalim mubeen
📖 हिंदी अर्थ
तो उनकी क़ौम के चन्द सरदारों ने कहा हम तो यक़ीनन देखते हैं कि तुम खुल्लम खुल्ला गुमराही में (पड़े) हो

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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْمَلَأُ: क़ौम के बड़े-बड़े सरदार और प्रतिष्ठित लोग।
  • ضَلَالٍ: सत्य से भटकना, गुमराही, सीधे मार्ग से हट जाना।
  • مُبِينٍ: स्पष्ट, प्रत्यक्ष, जो किसी पर छिपा न हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को एकेश्वरवाद (तौहीद) की ओर बुलाया और उन्हें मूर्तिपूजा से रोका, तो उनकी क़ौम के सरदारों और बुज़ुर्गों ने — जो अपनी सामाजिक हैसियत और धन-दौलत के कारण लोगों की नज़रों में बड़े माने जाते थे — उन्हें जवाब देते हुए कहा: "ऐ नूह! हम तो तुम्हें साफ़-साफ़ गुमराही में देख रहे हैं।" उनका कहना था कि तुमने अपने बाप-दादा का रास्ता छोड़ दिया है और एक नई बात लेकर आए हो जो हमारी समझ में बिल्कुल ग़लत और सत्य से दूर है। उन्होंने अपनी इस बात को "मुबीन" (स्पष्ट) कहा, यानी उनके अनुसार यह गुमराही इतनी ज़ाहिर थी कि उसमें किसी संदेह की गुंजाइश ही नहीं थी। यह उनके अहंकार और हठधर्मिता का प्रमाण था कि उन्होंने नूह (अलैहिस्सलाम) की सच्ची बात को सुनने और समझने की कोशिश ही नहीं की, बल्कि उल्टा उन्हें ही गुमराह कह दिया। यह स्थिति हर युग में उन लोगों की रही है जो सत्य के दावेदारों को अपनी मनमानी राय से परखते हैं, न कि तर्क और प्रमाण से।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहना: जब एक नबी को उसकी क़ौम के बड़े लोग गुमराह कहते हैं, तो यह साबित करता है कि सत्य का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता। मुसलमान को चाहिए कि वह लोगों की निंदा और उपहास की परवाह किए बिना सत्य पर क़ायम रहे।
  2. बड़ों की राय हमेशा सही नहीं होती: किसी भी समाज के सरदार और प्रतिष्ठित लोग गलती पर हो सकते हैं। इसलिए सच्चाई को उनकी राय से नहीं, बल्कि क़ुरआन और सुन्नत की कसौटी पर परखना चाहिए।
  3. विनम्रता से सत्य को सुनना: जो लोग अपने को बड़ा समझते हैं, वे अक्सर सत्य को स्वीकार नहीं कर पाते। हमें चाहिए कि हम अपने से छोटे या कमतर समझे जाने वाले लोगों की अच्छी बात को भी खुले दिल से सुनें।
  4. नबियों की सहनशीलता: हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम के इस कठोर जवाब पर धैर्य से काम लिया और उन्हें समझाते रहे। यह हमें सिखाता है कि दूसरों को सत्य की ओर बुलाते समय नरमी और सब्र से काम लेना चाहिए, चाहे सामने वाला कितना ही कठोर क्यों न हो।
  5. अहंकार का अंजाम: क़ौम के सरदारों का यह रवैया बताता है कि अहंकार और अपनी बड़ाई का भ्रम इंसान को सत्य से दूर कर देता है। इससे बचना चाहिए और हमेशा अल्लाह के सामने अपनी नम्रता बनाए रखनी चाहिए।


📜 आयत 58-62 — सूरा अल-आराफ

58وَالْبَلَدُ الطَّيِّبُ يَخْرُجُ نَبَاتُهُ بِإِذْنِ رَبِّهِ ۖ وَالَّذِي خَبُثَ لَا يَخْرُجُ إِلَّا نَكِدًا ۚ كَذَٰلِكَ نُصَرِّفُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَشْكُرُونَ
हम यूं ही (क़यामत के दिन ज़मीन से) मुर्दों को निकालेंगें ताकि तुम लोग नसीहत व इबरत हासिल करो और उम्दा ज़मीन उसके परवरदिगार के हुक्म से उस सब्ज़ा (अच्छा ही) है और जो ज़मीन बड़ी है उसकी पैदावार ख़राब ही होती है
59لَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
हम यू अपनी आयतों को उलेटफेर कर शुक्रग़ुजार लोगों के वास्ते बयान करते हैं बेशक हमने नूह को उनकी क़ौम के पास (रसूल बनाकर) भेजा तो उन्होनें (लोगों से ) कहाकि ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा की ही इबादत करो उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं है और मैं तुम्हारी निस्बत (क़यामत जैसे) बड़े ख़ौफनाक दिन के अज़ाब से डरता हूँ
60قَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ إِنَّا لَنَرَاكَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
तो उनकी क़ौम के चन्द सरदारों ने कहा हम तो यक़ीनन देखते हैं कि तुम खुल्लम खुल्ला गुमराही में (पड़े) हो
61قَالَ يَا قَوْمِ لَيْسَ بِي ضَلَالَةٌ وَلَٰكِنِّي رَسُولٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ
तब नूह ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम मुझ में गुमराही (वग़ैरह) तो कुछ नहीं बल्कि मैं तो परवरदिगारे आलम की तरफ से रसूल हूँ
62أُبَلِّغُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَأَنصَحُ لَكُمْ وَأَعْلَمُ مِنَ اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
तुम तक अपने परवरदिगार के पैग़ामात पहुचाएं देता हूँ और तुम्हारे लिए तुम्हारी ख़ैर ख्वाही करता हूँ और ख़ुदा की तरफ से जो बातें मै जानता हूँ तुम नहीं जानते
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अनुवाद — अल-आराफ 60

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Monday, September 28, 2026

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