अल-हिज्र · 68/99
अनुवाद उच्चारण — अल-हिज्र
قَالَ إِنَّ هَٰؤُلَاءِ ضَيْفِي فَلَا تَفْضَحُونِ ۝٦٨
Qaala inna haaa`ulaaa`i daifee falaa tafdahoon
📖 हिंदी अर्थ
लूत ने (उनसे कहा) कि ये लोग मेरे मेहमान है तो तुम (इन्हें सताकर) मुझे रुसवा बदनाम न करो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ضَيْفِي: मेरे अतिथि (मेहमान)
  • فَلَا تَفْضَحُونِ: मुझे अपमानित मत करो, मुझे रुसवा मत करो

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने देखा कि उनकी क़ौम के लोग बुरे इरादों के साथ उनके घर की ओर आ रहे हैं, और वे उनके मेहमानों (फ़रिश्तों) को नुक़सान पहुँचाना चाहते हैं, तो उन्होंने अपनी क़ौम से कहा: "ये लोग मेरे मेहमान हैं। मेहमान की इज़्ज़त करना मेरा फ़र्ज़ है, और तुम लोग मुझे शर्मिंदा मत करो।" उनका मतलब यह था कि अगर तुमने मेरे मेहमानों के साथ बुरा सुलूक किया, तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी रुसवाई और अपमान की बात होगी। हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराते हुए कहा कि अल्लाह का ख़ौफ़ करो और मेरे मेहमानों को तंग मत करो, क्योंकि इससे मैं अपनी क़ौम के सामने बदनाम हो जाऊँगा। यह उनका प्रयास था कि वे अपनी क़ौम को बुरे काम से रोकें और उन्हें नेकी की तरफ़ बुलाएँ। यहाँ से हमें यह सीख मिलती है कि मेहमान की इज़्ज़त करना और उसकी हिफ़ाज़त करना एक बहुत बड़ी नेकी है, और नेक लोग हमेशा अपने मेहमानों की ख़ातिरदारी और हिफ़ाज़त के लिए क़ुर्बानियाँ देते हैं।

फ़ायदे (लाभ):

  1. मेहमान की इज़्ज़त करना इस्लाम का एक ख़ूबसूरत अदब है। हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने अपने मेहमानों की हिफ़ाज़त के लिए अपनी पूरी कोशिश की, यहाँ तक कि अपनी क़ौम के सामने खड़े हो गए। यह हमें सिखाता है कि मेहमान की ख़ातिरदारी करना और उसकी हिफ़ाज़त करना हमारे ईमान का हिस्सा है।
  2. बुराई से रोकना हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को बुरे काम से रोकने की पूरी कोशिश की, भले ही उन्हें पता था कि वे नहीं मानेंगे। यह हमें सिखाता है कि हमें हमेशा नेकी का हुक्म देना और बुराई से रोकना चाहिए, चाहे लोग मानें या न मानें।
  3. अल्लाह पर भरोसा हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने मुश्किल हालात में अल्लाह पर भरोसा किया और अपनी क़ौम के सामने साहस के साथ खड़े रहे। यह हमें सिखाता है कि मुसीबत के वक़्त अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और हक़ की बात कहने से नहीं डरना चाहिए।
  4. इज़्ज़त और आबरू की हिफ़ाज़त हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने अपनी इज़्ज़त और आबरू की हिफ़ाज़त के लिए कोशिश की, और यह भी सिखाया कि इंसान को अपनी इज़्ज़त और दूसरों की इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करनी चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 66-70 — अल-हिज्र

66وَقَضَيْنَا إِلَيْهِ ذَٰلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دَابِرَ هَٰؤُلَاءِ مَقْطُوعٌ مُّصْبِحِينَ
कि बस सुबह होते होते उन लोगों की जड़ काट डाली जाएगी
67وَجَاءَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ
और (ये बात हो रही थीं कि) शहर के लोग (मेहमानों की ख़बर सुन कर बुरी नीयत से) खुशियाँ मनाते हुए आ पहुँचे
68قَالَ إِنَّ هَٰؤُلَاءِ ضَيْفِي فَلَا تَفْضَحُونِ
लूत ने (उनसे कहा) कि ये लोग मेरे मेहमान है तो तुम (इन्हें सताकर) मुझे रुसवा बदनाम न करो
69وَاتَّقُوا اللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ
और ख़ुदा से डरो और मुझे ज़लील न करो
70قَالُوا أَوَلَمْ نَنْهَكَ عَنِ الْعَالَمِينَ
वह लोग कहने लगे क्यों जी हमने तुम को सारे जहाँन के लोगों (के आने) की मनाही नहीं कर दी थी
अल-हिज्रकुरान सूची
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अनुवाद — अल-हिज्र 68

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Tuesday, August 18, 2026

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