मरियम · 12/98
अनुवाद उच्चारण — सूरा मरियम
يَا يَحْيَىٰ خُذِ الْكِتَابَ بِقُوَّةٍ ۖ وَآتَيْنَاهُ الْحُكْمَ صَبِيًّا ۝١٢
Yaa Yahyaa khuzil Kitaaba biquwwatinw wa aatainaahul hukma saiyyaa
📖 हिंदी अर्थ
(ग़रज़ यहया पैदा हुए और हमने उनसे कहा) ऐ यहया किताब (तौरेत) मज़बूती के साथ लो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
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A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ख़ुदिल-किताब: तौरात (पवित्र ग्रंथ) को।
  • बिक़ुव्वतिन: पूरी मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प के साथ।
  • अल-हुक्म: नबुव्वत (पैग़म्बरी), अथवा गहरी समझ और निर्णय की शक्ति।
  • सबिय्यन: छोटी उम्र में, बाल्यावस्था में ही।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत याह्या (अलैहिस्सलाम) पैदा हुए और वे उस उम्र को पहुँचे जब वे बात समझने और आदेश ग्रहण करने के काबिल हुए, तो अल्लाह तआला ने उन्हें सम्बोधित करते हुए फ़रमाया: "ऐ याह्या! तौरात को पूरी शक्ति, गंभीरता और परिश्रम के साथ थामो।" यानी उन्हें आदेश दिया गया कि वे इस पवित्र ग्रंथ को सिर्फ पढ़ें ही नहीं, बल्कि उसके शब्दों को याद करें, उसके अर्थों को समझें, और उस पर पूरी तरह अमल करें। यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी थी, और अल्लाह ने उन्हें यह अमानत सौंपी।

इसके साथ ही अल्लाह तआला ने उन्हें बचपन में ही "हुक्म" (नबुव्वत और गहरी समझ) प्रदान कर दी। वे अभी छोटी उम्र के थे, किशोरावस्था में ही थे, कि उन्हें असाधारण बुद्धि, दिव्य ज्ञान, और सही निर्णय लेने की क्षमता दे दी गई। यह अल्लाह की विशेष कृपा थी कि उन्होंने इतनी कम उम्र में ही इतना उच्च मर्तबा पा लिया।

इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अल्लाह की ओर से मिलने वाला ज्ञान और समझ उम्र की कसौटी पर निर्भर नहीं होता। अल्लाह जिसे चाहता है, उसे हिक्मत (ज्ञान और समझ) प्रदान करता है। साथ ही, यह भी सीख मिलती है कि अल्लाह के आदेशों को पूरी गंभीरता, मेहनत और लगन के साथ अपनाना चाहिए। जिस तरह हज़रत याह्या ने कम उम्र में ही अल्लाह की किताब को मज़बूती से थामा, हमें भी चाहिए कि हम कुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें — चाहे हमारी उम्र कुछ भी हो। अल्लाह की रहमत और फज़ल से कोई भी उम्र में ज्ञान और हिदायत पा सकता है, बशर्ते दिल में सच्ची लगन और नियत हो।



📜 आयत 10-14 — सूरा मरियम

10قَالَ رَبِّ اجْعَل لِّي آيَةً ۚ قَالَ آيَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلَاثَ لَيَالٍ سَوِيًّا
ज़करिया ने अर्ज़ की इलाही मेरे लिए कोई अलामत मुक़र्रर कर दें हुक्म हुआ तुम्हारी पहचान ये है कि तुम तीन रात (दिन) बराबर लोगों से बात नहीं कर सकोगे
11فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِ مِنَ الْمِحْرَابِ فَأَوْحَىٰ إِلَيْهِمْ أَن سَبِّحُوا بُكْرَةً وَعَشِيًّا
फिर ज़करिया (अपने इबादत के) हुजरे से अपनी क़ौम के पास (हिदायत देने के लिए) निकले तो उन से इशारा किया कि तुम लोग सुबह व शाम बराबर उसकी तसबीह (व तक़दीस) किया करो
12يَا يَحْيَىٰ خُذِ الْكِتَابَ بِقُوَّةٍ ۖ وَآتَيْنَاهُ الْحُكْمَ صَبِيًّا
(ग़रज़ यहया पैदा हुए और हमने उनसे कहा) ऐ यहया किताब (तौरेत) मज़बूती के साथ लो
13وَحَنَانًا مِّن لَّدُنَّا وَزَكَاةً ۖ وَكَانَ تَقِيًّا
और हमने उन्हें बचपन ही में अपनी बारगाह से नुबूवत और रहमदिली और पाक़ीज़गी अता फरमाई
14وَبَرًّا بِوَالِدَيْهِ وَلَمْ يَكُن جَبَّارًا عَصِيًّا
और वह (ख़ुद भी) परहेज़गार और अपने माँ बाप के हक़ में सआदतमन्द थे और सरकश नाफरमान न थे
मरियमकुरान सूची
98आयत
मक्कीअवतरण स्थान
12आयत

अनुवाद — मरियम 12

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Saturday, October 3, 2026

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