अश-शुआरा · 109/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ ۝١٠٩
Wa maaa as`alukum `alaihi min ajrin in ajriya illaa `alaa Rabbil `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
मेरी उजरत तो बस सारे जहाँ के पालने वाले ख़ुदा पर है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَسْأَلُكُمْ – मैं तुमसे माँगता हूँ
  • أَجْرٍ – बदला, पारिश्रमिक, पुरस्कार
  • إِنْ – नहीं (यहाँ निषेध के अर्थ में)
  • أَجْرِيَ – मेरा बदला, मेरा प्रतिफल
  • رَبِّ الْعَالَمِينَ – सारे संसारों का पालनहार

विस्तृत तफ़सीर:

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को जो पैग़ाम दिया, उसमें उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वे इस दावत और नसीहत के बदले में उनसे किसी प्रकार का सांसारिक लाभ या पारिश्रमिक नहीं चाहते। यह आयत उसी सच्चे और मख़लिस दावत-ए-दीन की तस्वीर पेश करती है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए दी जाती है।

नूह (अलैहिस्सलाम) फ़रमा रहे हैं: "मैं तुमसे इस हिदायत और नसीहत के बदले में कोई मेहनताना या इनाम नहीं माँगता। मेरा अज्र और सवाब तो बस अल्लाह रब्बुल आलमीन के ज़िम्मे है, जो सारे जहानों का पालनहार है।"

यह बयान दावत-ए-हक़ की सबसे बड़ी निशानी है। जब एक नबी या दाई ए-दीन अपनी दावत में कोई दुनियावी मुआवज़ा नहीं चाहता, तो उसकी सच्चाई और स्पष्ट हो जाती है। यही वजह है कि अल्लाह के सभी नबियों का तरीक़ा यही रहा है कि उन्होंने अपनी उम्मतों से कभी कोई माली या दुनियावी फ़ायदा नहीं माँगा।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि दीन की ख़िदमत और अल्लाह की राह में दावत का काम ख़ालिस नीयत से होना चाहिए। जो लोग दीन की ख़िदमत को अपनी रोज़ी-रोटी का ज़रिया बना लेते हैं, वे नबियों के तरीक़े से दूर हैं। सच्चा दाई वही है जो अल्लाह से सिर्फ़ उसका इनाम चाहता है और लोगों से किसी भी प्रकार का बदला नहीं माँगता।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह रब्बुल आलमीन अपने नेक बंदों का अज्र कभी ज़ाइ नहीं करता। जो लोग उसकी राह में अपना सब कुछ लुटा देते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतरीन बदला अता करता है। इसलिए हमें भी अपने अमल को ख़ालिस अल्लाह के लिए बनाना चाहिए और किसी भी नेक काम में दुनियावी फ़ायदे की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।

याद रखिए! जब हमारा काम सिर्फ़ अल्लाह के लिए होगा, तो अल्लाह ख़ुद हमारी मदद करेगा, हमारे रिज़्क़ में बरकत देगा और हमें कामयाबी उन रास्तों से अता करेगा जिनका हमें अंदाज़ा भी नहीं होगा। यही सच्चे ईमान की पहचान है कि बंदा अपने रब से ही उम्मीद रखे और उसी पर भरोसा करे।

🎧 सुनें

📜 आयत 107-111 — अश-शुआरा

107إِنِّي لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌ
तुम खुदा से डरो और मेरी इताअत करो
108فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ
और मैं इस (तबलीग़े रिसालत) पर कुछ उजरत तो माँगता नहीं
109وَمَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ الْعَالَمِينَ
मेरी उजरत तो बस सारे जहाँ के पालने वाले ख़ुदा पर है
110فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ
तो ख़ुदा से डरो और मेरी इताअत करो वह लोग बोले जब कमीनो मज़दूरों वग़ैरह ने (लालच से) तुम्हारी पैरवी कर ली है
111۞ قَالُوا أَنُؤْمِنُ لَكَ وَاتَّبَعَكَ الْأَرْذَلُونَ
तो हम तुम पर क्या ईमान लाएं
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अनुवाद — अश-शुआरा 109

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Tuesday, August 18, 2026

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