अस-साफ्फात · 33/182
अनुवाद उच्चारण — अस-साफ्फात
فَإِنَّهُمْ يَوْمَئِذٍ فِي الْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ ۝٣٣
Fa innahum Yawma`izin fil`azaabi mushtarikoon
📖 हिंदी अर्थ
ग़रज़ ये लोग सब के सब उस दिन अज़ाब में शरीक होगें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَإِنَّهُمْ – तो वे सब (अनुसरण करने वाले और जिनका अनुसरण किया गया)
  • يَوْمَئِذٍ – उस दिन (यानी क़ियामत के दिन)
  • فِي الْعَذَابِ – अज़ाब (यातना) में
  • مُشْتَرِكُونَ – एक साथ शामिल होंगे, साझेदार होंगे

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस भयानक दृश्य का चित्रण करती है जो क़ियामत के दिन सामने आएगा, जब सारे पर्दे उठा दिए जाएँगे और हर सच्चाई सामने आ जाएगी। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि जिन लोगों ने दुनिया में कुफ़्र और गुमराही का रास्ता अपनाया, चाहे वे बड़े सरदार थे जिन्होंने दूसरों को गुमराह किया, या वे आम लोग थे जिन्होंने उनकी पैरवी की — वे सब उस दिन अज़ाब में एक साथ शामिल होंगे। जिस तरह दुनिया में वे गुनाह और कुफ़्र में एक दूसरे के साथी थे, उसी तरह आख़िरत में भी अज़ाब में उनकी साझेदारी होगी। कोई भी अपने साथियों से अलग नहीं होगा, न कोई किसी का बोझ उठाएगा, बल्कि हर एक अपने किए का मज़ा चखेगा।

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करती है — कि दुनिया में जो रिश्ते और साथियाँ हम बनाते हैं, वे आख़िरत में या तो हमारे लिए रहमत का ज़रिया बनेंगे या अज़ाब का। जो लोग दुनिया में नेकी और हक़ की राह पर एक दूसरे के साथी होंगे, वे जन्नत में भी एक साथ होंगे। और जो लोग गुनाह और गुमराही में एक दूसरे के साथी बने, उनका अंजाम यही है कि वे जहन्नुम के अज़ाब में भी एक साथ होंगे।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हमें अपने साथियों और दोस्तों के चुनाव में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। अच्छे साथी हमें जन्नत की राह दिखाएँगे, और बुरे साथी हमें जहन्नुम की तरफ़ ले जाएँगे। यह अल्लाह का इंसाफ़ है कि जो लोग दुनिया में मिलकर गुनाह करते रहे, वे आख़िरत में भी मिलकर सज़ा पाएँगे — ताकि अल्लाह का हर फ़ैसला पूरे इंसाफ़ और हिकमत पर आधारित हो।

याद रखिए, यह दुनिया एक इम्तिहान की जगह है। आज हम जिन लोगों के साथ उठते-बैठते हैं, उन्हीं के साथ हमारा हश्र होगा। अल्लाह तआला हम सबको सच्चे दोस्तों की संगत नसीब करे और हमें उन लोगों में शामिल करे जो हक़ की राह पर एक दूसरे के साथी हैं — आमीन।



📜 आयत 31-35 — अस-साफ्फात

31فَحَقَّ عَلَيْنَا قَوْلُ رَبِّنَا ۖ إِنَّا لَذَائِقُونَ
फिर अब तो लोगों पर हमारे परवरदिगार का (अज़ाब का) क़ौल पूरा हो गया कि अब हम सब यक़ीनन अज़ाब का मज़ा चखेंगे
32فَأَغْوَيْنَاكُمْ إِنَّا كُنَّا غَاوِينَ
हम खुद गुमराह थे तो तुम को भी गुमराह किया
33فَإِنَّهُمْ يَوْمَئِذٍ فِي الْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ
ग़रज़ ये लोग सब के सब उस दिन अज़ाब में शरीक होगें
34إِنَّا كَذَٰلِكَ نَفْعَلُ بِالْمُجْرِمِينَ
और हम तो गुनाहगारों के साथ यूँ ही किया करते हैं ये लोग ऐसे (शरीर) थे
35إِنَّهُمْ كَانُوا إِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ
कि जब उनसे कहा जाता था कि खुदा के सिवा कोई माबूद नहीं तो अकड़ा करते थे
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अनुवाद — अस-साफ्फात 33

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Tuesday, August 18, 2026

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