अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- لِيَفْجُرَ: अर्थात खुलेआम गुनाह करना, बुराई में लिप्त रहना।
- أَمَامَهُ: उसके सामने, यानी आने वाले समय में।
तफसीर:
इस आयत में अल्लाह तआला इंसान की उस हालत का ज़िक्र कर रहा है जब वह क़ियामत के दिन और आख़िरत के हिसाब-किताब को नकारता है। यह इनकार सिर्फ़ शक या जहालत की वजह से नहीं होता, बल्कि इसका असली सबब इंसान की अपनी ख्वाहिश और मंशा होती है। इंसान चाहता है कि वह आज़ादाना तरीके से अपनी ज़िंदगी गुज़ारे, जो चाहे करे, किसी रोक-टोक और ज़िम्मेदारी का सामना न करना पड़े। वह इसलिए क़ियामत को झुठलाता है ताकि उसके सामने कोई रुकावट न हो और वह बेबाक होकर अपने मनमाने काम करता रहे।
यानी इंसान का यह इनकार किसी दलील या तर्क पर आधारित नहीं, बल्कि यह उसकी नफ्सियाती ख्वाहिश है कि वह आने वाले वक़्त में भी गुनाह और बुराई पर अड़ा रहे। वह डरता है कि अगर उसने क़ियामत और हिसाब को मान लिया तो उसे अपनी ज़िंदगी बदलनी पड़ेगी, अपनी ख्वाहिशों पर लगाम लगानी पड़ेगी। इसलिए वह उस सच्चाई से मुँह मोड़ता है जो उसकी मनमानी में रुकावट डालती है।
यह आयत हमें बताती है कि इंसान का दिल जब गुनाहों में डूब जाता है, तो वह हक़ को कबूल करने से कतराता है। उसकी सोच यह होती है कि अगर मौत के बाद कोई ज़िंदगी नहीं, कोई हिसाब नहीं, तो मैं जो चाहूँ करता रहूँ। यही वजह है कि वह क़ियामत के दिन के बारे में तंज़ और अंदाज़ में पूछता है कि "वह दिन कब आएगा?" — हालाँकि वह जानता है कि यह सवाल उसके इनकार और मज़ाक़ की वजह से है।
दावती पहलू:
प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें आईना दिखाती है। हमें खुद से सवाल करना चाहिए कि क्या हम भी उन लोगों में से हैं जो सिर्फ़ इसलिए हक़ से दूर हैं क्योंकि हम अपनी ख्वाहिशों पर क़ाबू नहीं रखना चाहते? क्या हम भी उस इंसान की तरह हैं जो क़ियामत को भूलकर अपनी मनमानी में मशगूल है? अल्लाह तआला हमें बताना चाहता है कि यह दुनिया की ज़िंदगी आख़िरी नहीं है। जिस दिन का वादा किया गया है वह ज़रूर आएगा। उस दिन हर इंसान से पूछा जाएगा कि उसने अपनी ज़िंदगी कैसे गुज़ारी। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ख्वाहिशों को अल्लाह की रज़ा के ताबे करें, क़ियामत के दिन पर ईमान रखें और उसके लिए तैयारी करें। यही कामयाबी की राह है — कि हम अपने सामने रखे हुए अंजाम को याद रखें और उसके मुताबिक अपनी ज़िंदगी बनाएँ। अल्लाह तआला हमें सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
📜 आयत 3-7 — अल-क़ियामा
अनुवाद — अल-क़ियामा 5
सूरा अल-क़ियामा आयत 5 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मगर इन्सान तो ये जानता है कि अपने आगे भी…सूरा आयत 5/40 — अल-क़ियामा القيامة (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़ियामा सुनें, अल-क़ियामा अनुवाद, अल-क़ियामा mp3, अल-क़ियामा pdf. आयत 3–7. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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