अल-हिज्र · 52/99
अनुवाद उच्चारण — अल-हिज्र
إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا قَالَ إِنَّا مِنكُمْ وَجِلُونَ ۝٥٢
Iz dakhaloo `alaihi faqaaloo salaaman qaala innaa minkum wajiloon
📖 हिंदी अर्थ
कि जब ये इबराहीम के पास आए तो (पहले) उन्होंने सलाम किया इबराहीम ने (जवाब सलाम के बाद) कहा हमको तो तुम से डर मालूम होता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • سَلَامًا: शांति और सुरक्षा की दुआ देते हुए, अर्थात "आप पर सलामती हो।"
  • وَجِلُونَ: डरने वाले, भयभीत, खौफ़ज़दा।

तफ़सीर:

यह उस समय की बात है जब अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्ते हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के पास आए। वे उनके घर में दाख़िल हुए और उन्हें सलाम किया, यानी "तुम पर सलामती हो।" हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने उनके सलाम का जवाब दिया और उन्हें अपना मेहमान समझकर उनकी ख़ातिरदारी के लिए एक मोटा-ताज़ा बछड़ा भूनकर उनके सामने पेश किया। उन्होंने यह समझा कि ये आम इंसान हैं, इसलिए उन्होंने मेहमाननवाज़ी का हक़ अदा करना चाहा। लेकिन जब फ़रिश्तों ने खाने से इनकार किया और उस भुने हुए बछड़े की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया, तो हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) उनके इस अजीब रवैये से डर गए। उन्होंने सोचा कि शायद ये लोग कोई बुरा इरादा रखते हैं या किसी अज़ाब के लिए आए हैं। इसलिए उन्होंने कहा: "हमें तुमसे डर लग रहा है।" यह डर स्वाभाविक था, क्योंकि उस वक़्त के रिवाज के मुताबिक़ जब कोई मेहमान खाना न खाए तो उससे बदगुमानी की जाती थी कि वह कोई बुरा मक़सद लेकर आया है।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें मेहमाननवाज़ी की अहमियत सीखने को मिलती है। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने मेहमानों के आते ही उनके लिए खाने का इंतज़ाम किया, और यह अल्लाह के नबियों की सुन्नत है। हमें भी अपने मेहमानों की ख़ातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए।
  2. इस आयत से यह भी पता चलता है कि इंसान के दिल में किसी अनजान या अजीब हालात से डर लगना कोई बुरी बात नहीं है, बल्कि यह इंसानी फ़ितरत है। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने डर का इज़हार किया, और अल्लाह ने उन्हें इस पर मलामत नहीं की, बल्कि फ़रिश्तों ने उन्हें खुशखबरी दी।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि जब किसी मेहमान को खाना पेश किया जाए और वह खाने से इनकार करे, तो उसके बारे में बुरा गुमान नहीं करना चाहिए, बल्कि अच्छा गुमान रखना चाहिए। हो सकता है कि उसके पीछे कोई वजह हो।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह के फ़रिश्ते नबियों के पास आकर उन्हें सलाम करते थे और उन्हें खुशखबरी देते थे। यह अल्लाह के नबियों की बड़ी इज़्ज़त और शान है।
  5. इस आयत में सलाम का जवाब देने की तरग़ीब है, क्योंकि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने फ़रिश्तों के सलाम का जवाब दिया, और यह इस्लामी आदाब में से है कि सलाम का बेहतर जवाब दिया जाए।


📜 आयत 50-54 — अल-हिज्र

50وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ
मगर साथ ही इसके (ये भी याद रहे कि) बेशक मेरा अज़ाब भी बड़ा दर्दनाक अज़ाब है
51وَنَبِّئْهُمْ عَن ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ
और उनको इबराहीम के मेहमान का हाल सुना दो
52إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا قَالَ إِنَّا مِنكُمْ وَجِلُونَ
कि जब ये इबराहीम के पास आए तो (पहले) उन्होंने सलाम किया इबराहीम ने (जवाब सलाम के बाद) कहा हमको तो तुम से डर मालूम होता है
53قَالُوا لَا تَوْجَلْ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ
उन्होंने कहा आप मुत्तालिक़ ख़ौफ न कीजिए (क्योंकि) हम तो आप को एक (दाना व बीना) फरज़न्द (के पैदाइश) की खुशख़बरी देते हैं
54قَالَ أَبَشَّرْتُمُونِي عَلَىٰ أَن مَّسَّنِيَ الْكِبَرُ فَبِمَ تُبَشِّرُونَ
इब्राहिम ने कहा क्या मुझे ख़ुशख़बरी (बेटा होने की) देते हो जब मुझे बुढ़ापा छा गया
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अनुवाद — अल-हिज्र 52

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Tuesday, August 18, 2026

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