अल-हिज्र · 74/99
अनुवाद उच्चारण — अल-हिज्र
فَجَعَلْنَا عَالِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِّن سِجِّيلٍ ۝٧٤
Faja`alnaa `aaliyahaa saafilahaa wa amtamaa `alaihim hijaaratam min sjijjeel
📖 हिंदी अर्थ
फिर हमने उसी बस्ती को उलट कर उसके ऊपर के तबके क़ो नीचे का तबक़ा बना दिया और उसके ऊपर उन पर खरन्जे के पत्थर बरसा दिए इसमें शक़ नहीं कि इसमें (असली बात के) ताड़ जाने वालों के लिए (कुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عَالِيَهَا سَافِلَهَا: उनकी बस्तियों का ऊपरी हिस्सा निचला कर दिया।
  • أَمْطَرْنَا: हमने बरसाया।
  • حِجَارَةً مِّن سِجِّيلٍ: पकी हुई मिट्टी के पत्थर (जो आग में पकाए गए हों या कठोर मिट्टी से बने हों)।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) की क़ौम ने अपनी सारी हदों को पार कर दिया और अल्लाह के आदेशों की अवहेलना करते हुए अश्लील कर्मों पर अड़ी रही, तो अल्लाह तआला ने उन पर अपना अज़ाब नाज़िल किया। अल्लाह ने उनकी बस्तियों को उलट दिया—यानी जो ऊपर था उसे नीचे कर दिया और जो नीचे था उसे ऊपर कर दिया। यह उनके पापों की सज़ा थी कि उनके घर और इमारतें तबाह हो गईं और उनके सिर उनके पैरों की तरफ हो गए। इसके बाद अल्लाह ने उन पर पकी हुई मिट्टी के कठोर पत्थरों की बारिश की, जो उन लोगों पर गिरे जो शहर से बाहर थे या बच निकलने की कोशिश कर रहे थे। ये पत्थर इस क़दर सख्त थे कि किसी भी चीज़ को चीरते हुए निकल जाते थे और किसी को बचने का मौका नहीं देते थे। यह अज़ाब उनके कुकर्मों का सीधा नतीजा था, क्योंकि उन्होंने अल्लाह के नबी को झुठलाया और अपनी शर्मनाक हरकतों से अल्लाह की रहमत से महरूम हो गए।


फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है—जब वह किसी क़ौम पर अज़ाब नाज़िल करता है, तो कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह की नाफ़रमानी से बचे।
  2. यह घटना हमें सिखाती है कि अल्लाह के नबियों की बात मानना और उनकी उम्मत में शामिल होना कितनी बड़ी नेमत है। जो लोग नबी की नसीहत को ठुकराते हैं, वे तबाही के हक़दार बन जाते हैं।
  3. अल्लाह की रहमत और अज़ाब दोनों उसके हाथ में हैं। जब तक मौका हो, इंसान को तौबा कर लेना चाहिए, क्योंकि अज़ाब आने के बाद पछतावा किसी काम नहीं आता।
  4. यह क़िस्सा हमें याद दिलाता है कि अल्लाह की नज़र में पापों की सज़ा सिर्फ आख़िरत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में भी हो सकती है। इसलिए हर मुसलमान को अपने अमल की इस्लाह (सुधार) करते रहना चाहिए और अल्लाह से डरते हुए ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए।


📜 आयत 72-76 — अल-हिज्र

72لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِي سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ
(इनसे निकाह कर लो) ऐ रसूल तुम्हारी जान की कसम ये लोग (क़ौम लूत) अपनी मस्ती में मदहोश हो रहे थे
73فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُشْرِقِينَ
(लूत की सुनते काहे को) ग़रज़ सूरज निकलते निकलते उनको (बड़े ज़ोरो की) चिघाड़ न ले डाला
74فَجَعَلْنَا عَالِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِّن سِجِّيلٍ
फिर हमने उसी बस्ती को उलट कर उसके ऊपर के तबके क़ो नीचे का तबक़ा बना दिया और उसके ऊपर उन पर खरन्जे के पत्थर बरसा दिए इसमें शक़ नहीं कि इसमें (असली बात के) ताड़ जाने वालों के लिए (कुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं
75إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّلْمُتَوَسِّمِينَ
और वह उलटी हुई बस्ती हमेशा (की आमदरफ्त)
76وَإِنَّهَا لَبِسَبِيلٍ مُّقِيمٍ
के रास्ते पर है
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अनुवाद — अल-हिज्र 74

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Tuesday, August 18, 2026

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