अल-हाक़्का · 27/52
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हाक़्का
يَا لَيْتَهَا كَانَتِ الْقَاضِيَةَ ۝٢٧
Yaa laitahaa kaanatil qaadiyah
📖 हिंदी अर्थ
ऐ काश मौत ने (हमेशा के लिए मेरा) काम तमाम कर दिया होता

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَا لَيْتَهَا: काश! (यहाँ 'हा' का संदर्भ मृत्यु से है)
  • الْقَاضِيَةَ: अंतिम निर्णायक, जीवन को पूर्ण रूप से समाप्त कर देने वाली, जिसके बाद कोई पुनर्जीवन न हो।

व्याख्या:

जब अभागे व्यक्ति को उसका आमालनामा बाएँ हाथ में दिया जाएगा, तो वह घोर पछतावे और हसरत के साथ कहेगा: "काश! वह मृत्यु जो मुझे दुनिया में आई थी, वही अंतिम और निर्णायक होती! काश मुझे दोबारा जीवित न किया जाता, और मैं इस हिसाब-किताब और अज़ाब का सामना न करता।" यह उसकी उस हालत की तस्वीर है जब वह अपने सामने अपने बुरे कर्मों की फेहरिस्त देखेगा और समझ जाएगा कि अब कोई मौका नहीं बचा, न कोई बहाना काम आएगा, न कोई सिफारिश उसे बचा सकेगी। वह चाहेगा कि काश उसकी मौत ही आखिरी मंज़िल होती और वह इस भयानक दिन को न देखता।

यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की ज़िंदगी एक इम्तिहान है, और मौत अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। जो लोग आज अल्लाह की इबादत और उसके हुक्मों से ग़ाफ़िल हैं, वे उस दिन ऐसी हसरतें करेंगे जो किसी काम न आएँगी। अल्लाह ने हमें मौका दिया है, रहमत का दरवाज़ा खुला है, तौबा की राह आसान है। आज ही अपने रब की तरफ लौट आएँ, अपने गुनाहों से तौबा करें, और अपने आमालनामे को रोशन करें, ताकि कल क़ियामत के दिन हमारा नाम सईदों (खुशकिस्मतों) की फेहरिस्त में लिखा जाए, और हम जन्नत की नेमतों से हमेशा के लिए नवाज़े जाएँ। याद रखिए, यह दुनिया का जीवन बहुत छोटा है, लेकिन इसकी कमाई आख़िरत में हमेशा हमारे साथ रहेगी।



📜 आयत 25-29 — सूरा अल-हाक़्का

25وَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِشِمَالِهِ فَيَقُولُ يَا لَيْتَنِي لَمْ أُوتَ كِتَابِيَهْ
और जिसका नामए आमाल उनके बाएँ हाथ में दिया जाएगा तो वह कहेगा ऐ काश मुझे मेरा नामए अमल न दिया जाता
26وَلَمْ أَدْرِ مَا حِسَابِيَهْ
और मुझे न मालूल होता कि मेरा हिसाब क्या है
27يَا لَيْتَهَا كَانَتِ الْقَاضِيَةَ
ऐ काश मौत ने (हमेशा के लिए मेरा) काम तमाम कर दिया होता
28مَا أَغْنَىٰ عَنِّي مَالِيَهْ ۜ
(अफ़सोस) मेरा माल मेरे कुछ भी काम न आया
29هَلَكَ عَنِّي سُلْطَانِيَهْ
(हाए) मेरी सल्तनत ख़ाक में मिल गयी (फिर हुक्म होगा)
अल-हाक़्काकुरान सूची
52आयत
मक्कीअवतरण स्थान
27आयत

अनुवाद — अल-हाक़्का 27

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Thursday, October 1, 2026

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