अल-आराफ · 115/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
قَالُوا يَا مُوسَىٰ إِمَّا أَن تُلْقِيَ وَإِمَّا أَن نَّكُونَ نَحْنُ الْمُلْقِينَ ۝١١٥
Qaaloo yaa Moosaaa immaaa an tulqiya wa immaaa an nakoona nahnul mulqeen
📖 हिंदी अर्थ
और मुक़र्रर वक्त पर सब जमा हुए तो बोल उठे कि ऐ मूसा या तो तुम्हें (अपने मुन्तसिर (मंत्र)) या हम ही (अपने अपने मंत्र फेके)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • إِمَّا – या तो (विकल्प के लिए)
  • تُلْقِيَ – तुम डालो (अपनी लाठी)
  • الْمُلْقِينَ – डालने वाले (अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ)

व्याख्या:

जब मूसा (अलैहिस्सलाम) और फ़िरऔन के जादूगरों का मुक़ाबला हुआ, तो जादूगरों ने अपनी शक्ति और कला पर पूरा भरोसा रखते हुए, घमंड और अकड़ के साथ मूसा से कहा: "हे मूसा! तुम चाहो तो पहले अपनी लाठी डालो, या हम पहले अपनी चीज़ें डालते हैं।" उन्होंने यह इसलिए कहा क्योंकि उन्हें अपनी जादूगरी पर पूरा विश्वास था और वे समझते थे कि वे किसी भी सूरत में जीतेंगे। उन्होंने मूसा को यह विकल्प देकर यह दिखाना चाहा कि उन्हें किसी बात की परवाह नहीं है, और वे पूरी तरह आश्वस्त हैं कि उनकी जादूगरी मूसा के मुक़ाबले में कामयाब रहेगी। यह उनका अहंकार और आत्मविश्वास था, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि सच्चाई और ईश्वरीय शक्ति के आगे उनका सारा जादू बेकार हो जाएगा।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें सबक मिलता है कि इंसान अपनी कला, हुनर और ताकत पर कितना भी घमंड कर ले, लेकिन अल्लाह की ताकत और उसकी मदद के आगे सब कुछ बेकार है। जादूगरों का घमंड उनके काम न आया और अल्लाह ने मूसा की सच्चाई को ज़ाहिर कर दिया।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों को अपने विरोधियों की बड़ाई और धमकियों से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि अल्लाह अपने नेक बंदों की मदद करता है।
  3. इससे यह भी पता चलता है कि इंसान को अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखना चाहिए, लेकिन साथ ही अल्लाह पर भी पूरा भरोसा होना चाहिए, क्योंकि असली कामयाबी अल्लाह के हाथ में है।


📜 आयत 113-117 — सूरा अल-आराफ

113وَجَاءَ السَّحَرَةُ فِرْعَوْنَ قَالُوا إِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ الْغَالِبِينَ
ग़रज़ जादूगर सब फिरऔन के पास हाज़िर होकर कहने लगे कि अगर हम (मूसा से) जीत जाएं तो हमको बड़ा भारी इनाम ज़रुर मिलना चाहिए
114قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ لَمِنَ الْمُقَرَّبِينَ
फिरऔन ने कहा (हॉ इनाम ही नहीं) बल्कि फिर तो तुम हमारे दरबार के मुक़र्रेबीन में से होगें
115قَالُوا يَا مُوسَىٰ إِمَّا أَن تُلْقِيَ وَإِمَّا أَن نَّكُونَ نَحْنُ الْمُلْقِينَ
और मुक़र्रर वक्त पर सब जमा हुए तो बोल उठे कि ऐ मूसा या तो तुम्हें (अपने मुन्तसिर (मंत्र)) या हम ही (अपने अपने मंत्र फेके)
116قَالَ أَلْقُوا ۖ فَلَمَّا أَلْقَوْا سَحَرُوا أَعْيُنَ النَّاسِ وَاسْتَرْهَبُوهُمْ وَجَاءُوا بِسِحْرٍ عَظِيمٍ
मूसा ने कहा (अच्छा पहले) तुम ही फेक (के अपना हौसला निकालो) तो तब जो ही उन लोगों ने (अपनी रस्सियाँ) डाली तो लोगों की नज़र बन्दी कर दी (कि सब सापँ मालूम होने लगे) और लोगों को डरा दिया
117۞ وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ أَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَإِذَا هِيَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ
और उन लोगों ने बड़ा (भारी जादू दिखा दिया और हमने मूसा के पास वही भेजी कि (बैठे क्या हो) तुम भी अपनी छड़ी डाल दो तो क्या देखते हैं कि वह छड़ी उनके बनाए हुए (झूठे साँपों को) एक एक करके निगल रही है
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
115आयत

अनुवाद — अल-आराफ 115

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Thursday, October 1, 2026

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