अल-बकरा · 72/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَادَّارَأْتُمْ فِيهَا ۖ وَاللَّهُ مُخْرِجٌ مَّا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ ۝٧٢
Wa iz qataltum nafsan faddaara`tum feehaa wallaahu mukrijum maa kuntum taktumoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब एक शख्स को मार डाला और तुममें उसकी बाबत फूट पड़ गई एक दूसरे को क़ातिल बताने लगा जो तुम छिपाते थे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَادَّارَأْتُمْ: तुमने आपस में झगड़ा किया, एक-दूसरे पर आरोप लगाए और हर एक ने अपनी ओर से इल्ज़ाम हटाने की कोशिश की।
  • مُخْرِجٌ: प्रकट करने वाला, बाहर निकालने वाला।
  • تَكْتُمُونَ: छिपाते थे, गुप्त रखते थे।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईसराइल की संतानो! उस समय को याद करो जब तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी, फिर उस हत्या के मामले में तुम आपस में झगड़ने लगे। हर एक अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश करता और दोष दूसरे पर मढ़ने की कोशिश करता। तुमने उस मासूम इंसान को मार डाला, लेकिन जब पूछताछ हुई तो कोई भी अपना जुर्म कबूल करने को तैयार नहीं था। तुम लोगों ने यह सोचा था कि यह राज़ हमेशा छिपा रहेगा, लेकिन अल्लाह तआला को तुम्हारे सारे भेद मालूम थे। वह उस हत्या के असली कातिल को प्रकट करने वाला था, चाहे तुम कितना ही छिपाने की कोशिश कर लो। अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उस हत्या का राज़ खोल दिया और सच्चाई सामने आ गई, जैसा कि आगे की आयत में बयान होगा कि उन्होंने एक गाय ज़बह करने का हुक्म दिया और उसके एक टुकड़े से मुर्दे को ज़िंदा करके असली कातिल का पता चला।

फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह तआला हर छिपे राज़ को जानता है, चाहे इंसान कितनी ही चालाकी से अपने जुर्म को छिपाने की कोशिश करे। यह हमें सिखाता है कि हमें हमेशा सच्चाई पर चलना चाहिए और कभी झूठ या धोखे का सहारा नहीं लेना चाहिए।
  2. हत्या एक बहुत बड़ा गुनाह है, और इस्लाम में किसी मासूम की जान लेना सख्त मना है। यह आयत हमें इंसानी ज़िंदगी की अहमियत और उसके सम्मान का सबक देती है।
  3. जब इंसान गलती कर बैठता है, तो उसे चाहिए कि वह अल्लाह से तौबा करे और सच्चाई कबूल करे, क्योंकि अल्लाह के सामने झूठ और छिपाव कभी काम नहीं आता।
  4. अल्लाह की क़ुदरत और उसके इंसाफ़ का यह नमूना है कि वह हर हाल में सच्चाई को ज़ाहिर करके रहेगा, इसलिए हमें अल्लाह के फैसले पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी राह पर चलना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 70-74 — अल-बकरा

70قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِيَ إِنَّ الْبَقَرَ تَشَابَهَ عَلَيْنَا وَإِنَّا إِن شَاءَ اللَّهُ لَمُهْتَدُونَ
तब कहने लगे कि तुम अपने खुदा से दुआ करो कि हमें ज़रा ये तो बता दे कि वह (गाय) और कैसी हो (वह) गाय तो और गायों में मिल जुल गई और खुदा ने चाहा तो हम ज़रूर (उसका) पता लगा लेगे
71قَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَّا ذَلُولٌ تُثِيرُ الْأَرْضَ وَلَا تَسْقِي الْحَرْثَ مُسَلَّمَةٌ لَّا شِيَةَ فِيهَا ۚ قَالُوا الْآنَ جِئْتَ بِالْحَقِّ ۚ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا يَفْعَلُونَ
मूसा ने कहा खुदा ज़रूर फरमाता है कि वह गाय न तो इतनी सधाई हो कि ज़मीन जोते न खेती सीचें भली चंगी एक रंग की कि उसमें कोई धब्बा तक न हो, वह बोले अब (जा के) ठीक-ठीक बयान किया, ग़रज़ उन लोगों ने वह गाय हलाल की हालाँकि उनसे उम्मीद न थी वह कि वह ऐसा करेंगे
72وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَادَّارَأْتُمْ فِيهَا ۖ وَاللَّهُ مُخْرِجٌ مَّا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ
और जब एक शख्स को मार डाला और तुममें उसकी बाबत फूट पड़ गई एक दूसरे को क़ातिल बताने लगा जो तुम छिपाते थे
73فَقُلْنَا اضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا ۚ كَذَٰلِكَ يُحْيِي اللَّهُ الْمَوْتَىٰ وَيُرِيكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
खुदा को उसका ज़ाहिर करना मंजूर था पस हमने कहा कि उस गाय को कोई टुकड़ा लेकर इस (की लाश) पर मारो यूँ खुदा मुर्दे को ज़िन्दा करता है और तुम को अपनी कुदरत की निशानियाँ दिखा देता है
74ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُم مِّن بَعْدِ ذَٰلِكَ فَهِيَ كَالْحِجَارَةِ أَوْ أَشَدُّ قَسْوَةً ۚ وَإِنَّ مِنَ الْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ الْأَنْهَارُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ الْمَاءُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ اللَّهِ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
ताकि तुम समझो फिर उसके बाद तुम्हारे दिल सख्त हो गये पस वह मिसल पत्थर के (सख्त) थे या उससे भी ज्यादा करख्त क्योंकि पत्थरों में बाज़ तो ऐसे होते हैं कि उनसे नहरें जारी हो जाती हैं और बाज़ ऐसे होते हैं कि उनमें दरार पड़ जाती है और उनमें से पानी निकल पड़ता है और बाज़ पत्थर तो ऐसे होते हैं कि खुदा के ख़ौफ से गिर पड़ते हैं और जो कुछ तुम कर रहे हो उससे खुदा ग़ाफिल नहीं है
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अनुवाद — अल-बकरा 72

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Tuesday, August 18, 2026

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