अल-क़सस · 62/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ ۝٦٢
Wa Yawma yunaadeehim fa-yaqoolu aina shurakaaa `iyal lazeena kuntum taz`umoon
📖 हिंदी अर्थ
और जिस दिन ख़ुदा उन कुफ्फ़ार को पुकारेगा और पूछेगा कि जिनको तुम हमारा शरीक ख्याल करते थे वह (आज) कहाँ हैं (ग़रज़ वह शरीक भी बुलाँए जाएँगे)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُنَادِيهِمْ – उन्हें पुकारेगा
  • أَيْنَ – कहाँ हैं
  • شُرَكَائِي – मेरे साझीदार (जिन्हें तुम मेरा साझीदार मानते थे)
  • تَزْعُمُونَ – तुम दावा करते थे / गुमान रखते थे

तफ़सीर:

और हे नबी! उस दिन को याद करो जब अल्लाह तआला मुशरिकों को पुकारेगा और उनसे पूछेगा: "कहाँ हैं मेरे वे साझीदार जिन्हें तुम दुनिया में मेरा साझीदार मानते थे और उनकी पूजा करते थे?" यह पुकार उस समय होगी जब हर आँख खुली होगी, हर राज़ खुला होगा, और हर झूठ बेनक़ाब हो चुका होगा।

यह प्रश्न केवल डाँट और फटकार के लिए होगा, क्योंकि अल्लाह को उनके ठिकाने का पूरा इल्म है। इसका उद्देश्य उन्हें उनके कुकर्मों की सज़ा से पहले शर्मिंदा करना और उनके झूठे दावों को बेनक़ाब करना है। जिन्हें वे दुनिया में अल्लाह का साझीदार कहते थे—चाहे वे मूर्तियाँ हों, पीर-औलिया हों, सितारे हों या फ़रिश्ते—उस दिन उनमें से कोई भी मौजूद नहीं होगा, न कोई उनकी मदद करेगा, न कोई उनकी सिफ़ारिश करेगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि तौहीद (अल्लाह की एकता) ही सच्चा रास्ता है। जो लोग अल्लाह के सिवा किसी और को पूजते हैं या किसी और को उसका साझीदार बनाते हैं, वे क़ियामत के दिन बिल्कुल अकेले और बेसहारा होंगे। उनके माबूद उनसे बराअत (बेज़ारी) कर लेंगे और वे सख़्त नदामत और पछतावे में डूबे होंगे।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें आज ही अपने ईमान की जाँच करने की तरग़ीब देती है। क्या हम सच में अल्लाह को ही अपना मालिक, मददगार और पूज्य मानते हैं? क्या हमारे दिलों में किसी और का खौफ़ या उम्मीद अल्लाह से बढ़कर है? याद रखिए, उस दिन कोई साझीदार नहीं होगा, कोई वसीला नहीं होगा, सिर्फ़ अल्लाह की रहमत और उसका फ़ैसला होगा। आइए, हम अपने जीवन को ख़ालिस तौहीद पर क़ायम करें, ताकि उस दिन हम उन लोगों में से न हों जिनसे यह सवाल पूछा जाएगा, बल्कि उन लोगों में से हों जिनके चेहरे रोशन होंगे और जिनका हिसाब आसान होगा। अल्लाह हम सबको सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 60-64 — अल-क़सस

60وَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और तुम लोगों को जो कुछ अता हुआ है तो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी का फ़ायदा और उसकी आराइश है और जो कुछ ख़ुदा के पास है वह उससे कही बेहतर और पाएदार है तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते
61أَفَمَن وَعَدْنَاهُ وَعْدًا حَسَنًا فَهُوَ لَاقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَاهُ مَتَاعَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنَ الْمُحْضَرِينَ
तो क्या वह शख्स जिससे हमने (बेहश्त का) अच्छा वायदा किया है और वह उसे पाकर रहेगा उस शख्स के बराबर हो सकता है जिसे हमने दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) फायदे अता किए हैं और फिर क़यामत के दिन (जवाब देही के वास्ते हमारे सामने) हाज़िर किए जाएँगें
62وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
और जिस दिन ख़ुदा उन कुफ्फ़ार को पुकारेगा और पूछेगा कि जिनको तुम हमारा शरीक ख्याल करते थे वह (आज) कहाँ हैं (ग़रज़ वह शरीक भी बुलाँए जाएँगे)
63قَالَ الَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ رَبَّنَا هَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَغْوَيْنَا أَغْوَيْنَاهُمْ كَمَا غَوَيْنَا ۖ تَبَرَّأْنَا إِلَيْكَ ۖ مَا كَانُوا إِيَّانَا يَعْبُدُونَ
वह लोग जो हमारे अज़ाब के मुस्ताजिब हो चुके हैं कह देगे कि परवरदिगार यही वह लोग हैं जिन्हें हमने गुमराह किया था जिस तरह हम ख़़ुद गुमराह हुए उसी तरह हमने इनको गुमराह किया-अब हम तेरी बारगाह में (उनसे) दस्तबरदार होते है-ये लोग हमारी इबादत नहीं करते थे
64وَقِيلَ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا لَهُمْ وَرَأَوُا الْعَذَابَ ۚ لَوْ أَنَّهُمْ كَانُوا يَهْتَدُونَ
और कहा जाएगा कि भला अपने उन शरीको को (जिन्हें तुम ख़ुदा समझते थे) बुलाओ तो ग़रज़ वह लोग उन्हें बुलाएँगे तो वह उन्हें जवाब तक नही देगें और (अपनी ऑंखों से) अज़ाब को देखेंगें काश ये लोग (दुनिया में) राह पर आए होते
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अनुवाद — अल-क़सस 62

सूरा अल-क़सस आयत 62 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जिस दिन ख़ुदा उन कुफ्फ़ार को पुकारेगा और पूछेगा…

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Tuesday, August 18, 2026

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